वर्षा
(1) अंक भर-भर नव सलेटी बादलों को
स्नेह-पूरित आ गयी बरसात रे !
हर मलिन उर को सहज ही दे गयी मधु-
भावनाओं की नयी सौगात रे !
(2) एकरसता स्वर अनारत भंग कर जब
राग बन रिमझिम बरसती है घटा,
दूर क्षितिजों तक बिखर जाती अनावृत
हो तभी नव-सृष्टि की गोपन छटा !
(3) मन-सरोवर में नई हलचल लिए, नव
हाव से रह-रह थिरकतीं उर्मियाँ,
कौन ने अव्यक्त मधुरस-धार में यों
प्राण मेरा आज रे नहला दिया !
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