महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

वर्षा

(1) अंक भर-भर नव सलेटी बादलों को

स्नेह-पूरित आ गयी बरसात रे !

हर मलिन उर को सहज ही दे गयी मधु-

भावनाओं की नयी सौगात रे !

(2) एकरसता स्वर अनारत भंग कर जब

राग बन रिमझिम बरसती है घटा,

दूर क्षितिजों तक बिखर जाती अनावृत

हो तभी नव-सृष्टि की गोपन छटा !

(3) मन-सरोवर में नई हलचल लिए, नव

हाव से रह-रह थिरकतीं उर्मियाँ,

कौन ने अव्यक्त मधुरस-धार में यों

प्राण मेरा आज रे नहला दिया !

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महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

दीप जलाओ

आँगन-आँगन दीप जलाओ,

दीपों का त्योहार मनाओ !

स्वर्णिम आभा घर-घर बिखरे,

मनहर आनन, कन-कन निखरे,

ज्योतिर्मय सागर लहराये

काली - काली रात सजाओ !

निशि अलकों में भर-भर रोली,

नाचें जगमग किरनें भोली,

आलोक घटा घिर-घिर आये

सारी सुध-बुध भूल नहाओ !

हर उर अभिनव नेह भरा हो,

युग-युग रोई धन्य धरा हो,

चलो सुहागिन, थाल उठाओ

नभ - गंगा में दीप बहाओ !

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महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

दीप-माला

आज घर-घर छा रहा उल्लास !

भर हृदय में प्रीत

मधु मदिर संगीत

आज घर-घर दीपकलिका वास !

नव सुनहरा गात

जगमगाती रात

आज घर-घर जा लुटाती हास !

कर रमन शृंगार

भर उमंग विहार

आज घर-घर दीपमाला रास !

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महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

अभिषेक

माना अमावस की अँधेरी रात है,

पर, भीत होने की अरे क्या बात है ?

एक पल में लो अभी

जगमग नये आलोक के दीपक जलाता हूँ !

माना, अशोभन, प्रिय धरा का वेष है,

मन में पराजय की व्यथा ही शेष है,

पर,निमिष में लो अभी

अभिनव कला से फिर नयी दुलहिन सजाता हूँ !

कह दो अँधेरे से प्रभा का राज है,

हर दीप के सिर पर सुशोभित ताज है,

कुछ क्षणों में लो अभी

अभिषेक आयोजन दिशाओं में रचाता हूँ !

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महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

दीप धरो

सखि ! दीप धरो !

काली-काली अब रात न हो,

घनघोर तिमिर बरसात न हो,

बुझते दीपों में हौले - हौले

सखि ! स्नेह भरो !

दमके प्रिय आनन हास लिए,

आगत नवयुग की आस लिए,

अरुणिम अधरों से हौले-हौले

सखि ! बात करो !

बीते बिरहा के सजल बरस,

गूँजे मंगल नव गीत सरस,

घर आये प्रियतम, हौले-हौले

सखि ! हीय हरो !

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महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

रात बीती . .

याद रह-रह आ रही है,

रात बीती जा रही है !

ज़िन्दगी के आज इस सुनसान में

जागता हूँ मैं तुम्हारे ध्यान में

सृष्टि सारी सो गयी है,

भूमि लोरी गा रही है !

झूमते हैं चित्र नयनों में कयी

गत तुम्हारी बात हर लगती नयी

आज तो गुज़रे दिनों की

बेरुख़ी भी भा रही है !

बह रहे हैं हम समय की धार में,

प्राण ! रखना, पर भरोसा प्यार में,

कल खिलेगी उर-लता जो

किस क़दर मुरझा रही है !

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महेंद्रभटनागर के गीत्…गीति-संगीति

अगहन की रात

तुम नहीं; और अगहन की ठंडी रात !

संध्या से ही सूना-सूना, मन बेहद भारी है,

मुरझाया-सा जीवन-शतदल, कैसी लाचारी है !

है जाने कितनी दूर सुनहरा प्रात !

खोकर सपनों का धन, आँखें बेबस बोझिल निर्धन,

देख रही हैं भावी का पथ, भर-भर आँसू के कन,

डोल रहा अंतर पीपल का-सा पात !

है दूर रोहिणी का आँचल, रोता मूक कलाधर,

खोज रहा हर कोना, बिखरा जुन्हाई का सागर,

किसको रे आज बताएँ मन की बात !

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